पत्नी के प्रति

  • Write a comment...
पत्नी के प्रति 
तुम रसोई में रखी आटा हो 
और मैं गिलास में रखा पानी 
हमारा मन तुम्हारा मन 
एकाकार बनकर 
रोटी बन जाना चाहता है
जिसके खाने का स्वाद
इन्द्रियों की गहराइयों तक उतर जाए ,
तुम स्नानागार में रखी डिटर्जेंट पाउडर की तरह हो
जिससे धुलने के बाद कपड़े पर छा जाती है सफेदी
उस सफेदी से तन में नहीं मन में भी चमक आती है
तुम उस दर्जी की तरह हो
जिसके यहाँ अपना फटा – पुराना कपड़ा छोड़ आता हूँ
और वह शलीके से सीकर कपड़े को नया उम्र दे देता है
ठीक उसी तरह तुम हर रोज मेरे अस्त –व्यस्त जीवन को
सजा देती हो ,
तुम्हारा वजूद का अहसास मेरे लिए ठीक वैसा ही है
जैसे मोतियाबिंद के बाद आँख वजूद ,
तुम मेरी वासना की उद्दाम लालसा नहीं
बल्कि रसोई में रखी नमक की तरह हो
जिसके बगैर भोजन स्वाद हीन हो जाता है
ठीक उसी तरह पुरुष का जीवन सारहीन
मेरे लिए तुम जीवन बीमा की वह पॉलिसी हो
जो जिन्दगी के साथ भी जिन्दगी के बाद भी |
( क्षण -क्षण नाराज होने वाली चंदा के प्रति जो मुझे असफल पति होने का अपराधबोध कराती है ) -जितेन्द्र कबीर

Comments