आकाशवाणी चित्तौड़गढ़ में दी गई वार्ता से साभार
तुलसी राम की आत्मकथा मुर्दहिया / जितेन्द्र यादव
आधुनिक हिंदी साहित्य की संवेदना के विस्तार में जिस तरह दलित आत्मकथाओं ने योगदान देकर साहित्य को समृद्ध किया है .उसी कड़ी में डॉ तुलसी राम की आत्मकथा मुर्दहिया भी जानी जाती है .तदभव पत्रिका में धारावाहिक रूप में प्रकाशन के दौरान ही अपनी लोकप्रियता की चरम पहुची यह आत्मकथा पुस्तकाकार रूप में भी उतनी ही लोकप्रियता प्राप्त की है .जूठन की तरह मुर्दहिया को भी दलित और गैर दलित दोनों वर्ग के लेखकों ने समान रूप से स्वीकार किया.
डा.तुलसी राम का जन्म आजमगढ़ जिले के धरमपुर नामक गाँव में 1 जुलाई 1949 को हुआ था. काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा हासिल करने के बाद जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में सेंटर फॉर रशियन एंड सेन्ट्रल एशियन स्टडीज ,स्कूल ऑफ़ इंटरनेशनल स्टडीज में प्रोफेसर के पद पर कार्यरत रहे .तुलसी राम को अंतर्राष्ट्रीय बौद्ध आन्दोलन ,दलित राजनीति तथा साहित्य में भी विशेषज्ञता हासिल है .उन्होंने इन विषयों पर सैकड़ो लेख लिखे है .एक धर्मनिरपेक्ष विद्वान् के रूप में मार्क्स ,बुद्ध तथा अम्बेडकर उनके नायक है .इनकी मृत्यु 13
फरवरी 2015 को हुई .
मुर्दहिया केवल लेखक की आत्मकथा नहीं बल्कि धरमपुर की दलित बस्ती के उन तमाम लोगों की भी आत्मकथा है जो अपने अंदर हजारों दुःख दर्द लिए मुर्दहिया में दफन हो गए थे लेखक को विश्वास है कि ‘यदि उनमें से किसी की भी आत्मकथा लिखी जाती तो उसका शीर्षक मुर्दहिया ही होता .यह आत्मकथा समूचे पूर्वी उत्तर प्रदेश के ग्राम्यांचल का सामाजिक ,आर्थिक एवं राजनैतिक रिपोतार्ज भी है .लेखक ने अपने गाँव और उसके आस –पास के तमाम गांवों का इतिहास भूगोल बताते हुए एक प्रकार से उस अंचल की सांस्कृतिक इतिहास लिखने की पहलकदमी की है .मुर्दहिया की सबसे बड़ी विशेषता है वह अपने साथ पूरे समाज के रीति –रिवाज विविध लोकरंग लोकगीत ,लोकसंगीत ,लोकनृत्य को बारीक़ और सूक्ष्म दृष्टि से उकेरा है .लोकजीवन को परखने की इतनी गहरी लोकदृष्टि लेखक की अपनी निजी विशेषता है .वस्तुतः मुर्दहिया एक लोकरंगी लेखक की लोकधर्मी आत्मकथा है .इसमें चित्रित लोकचरित्र जोगी बाबा ,नटिनीया ,पग्गल बाबा ,बंकिया डोम ,चूड़ीहारा ,पटहारा ,मदारी ,बाइसकोपवाला आदि अपनी व्यावसायिक संगीत ध्वनियों से अभावग्रस्त जिन्दगी जीने वाले दलित बच्चों को जीने की कला सिखाते है .मुर्दहिया को पढ़ते वक्त एक चीज जो बार –बार आती है वह है अन्धविश्वास और भूत –प्रेत के किस्से इसीलिए लेखक ने आत्मकथा का पहला शीर्षक का नाम ही भुतही पारिवारिक पृष्ठभूमि रखा है जिसमें लेखक ने लिखा है कि पिता जी के अनुसार दादा को भूत ने लाठियों से पिट –पिट कर मार डाला था इस कारण लेखक का परिवार और भी ज्यादा अंधविश्वासी हो गया था .इन्ही अंधविश्वास के कारण चेचक के दौरान लेखक अपनी एक आँख खोकर जन्म भर के लिए कनवा बन गया यानी अशुभ और असगुन .लोग सामने पड़ने से कतराते थे रास्ते बदल देते या कनवा कहकर दुत्कारते ,दुनिया भर के पूजा –पाठ,झाड़ –फूक टोने –टोटके किए मगर न चमरिया माई ने मदद की न दूसरे भूत –प्रेतों ने ,भूतों की वहाँ के जीवन में कितनी घूस –पैठ है इसके चित्रात्मक वर्णन आत्मकथा के प्रारम्भिक भाग में भरे पड़े है . .भूत – प्रेत की कहानियां तो वहाँ की रोजमर्रा के जीवन में बसे हुए है हर सफलता –असफलता के पीछे भूत प्रेत की कहानीयां गढ़ी हुई है .इसलिए हर छोटी –छोटी घटना पर सूअर ,व बकरे की बलि देना दलित जीवन का अनिवार्य हिस्सा था .
आत्मकथा का शुरूआती वाक्य ही है ‘मुर्खता मेरी जन्मजात विरासत थी .मानव जाति का वह पहला व्यक्ति जो जैविक रूप से मेरा खानदानी पूर्वज था ,उसके और मेरे बीच न जाने कितने पैदा हुए किन्तु उनमें से कोई पढ़ा लिखा नहीं था ......सदियों पुरानी इस अशिक्षा का परिणाम यह हुआ कि मुर्खता और मुर्खता के चलते अन्धविश्वासों का बोझ मेरे पूर्वजों के सिर से कभी नहीं उतरा .इस घनघोर अशिक्षा में पले –बढ़े तुलसी राम भी बचपन में भूत –प्रेत अंधविश्वास के शिकार हो जाते है .तुलसी राम को विद्यालय पढ़ने के लिए भेजे जाने के पीछे भी एक मज़बूरी है लेखक ने स्वयं लिखा है ‘हमारे परिवार के जो लोग आसनसोल और कलकत्ता में खानों और मीलों में काम करते थे ,कभी –कभी पोस्टकार्ड पर चिठियाँ भेजा करते थे ,हमारी दलित बस्ती में कोई पढ़ा –लिखा नहीं था .गाँव में ब्राह्मण ही पढ़े लिखे थे ,वे अकसर दलितों की चिट्ठियाँ पढ़ने में आनाकानी करते तथा पढ़ने के पहले अपमानजनक बातें सुनाते ,इस व्यवहार से उबकर घर वालों की कृपा दृष्टी सबसे छोटा बालक होने के कारण मेरे ऊपर पड़ी .परिणामस्वरूप पूर्वोक्त शिव मन्दिर के पास स्थित प्राइमरी स्कूल में मुझे चिठ्ठी पढ़ने लायक बनाने के उद्देश्य से भेजा जाने लगा .अपने घर में शिक्षा को लेकर लेखक की पीड़ा देखने लायक है ‘हमारा परिवार सयुंक्त रूप से बृहद होने के साथ –साथ वास्तव में एक अजायबघर ही था ,जिसमें भूत –प्रेत ,देवी –देवता ,सम्पन्नता –विपन्नता ,शकुन –अपशकुन ,मान –अपमान ,सत्य –असत्य ,इर्ष्या –द्वेष ,सुख –दुःख आदि सब कुछ था किन्तु शिक्षा कभी नहीं थी .
इस आत्मकथा में ग्रामीण संवेदना के प्रति लेखक का भावनात्मक जुडाव है.,गांवों में ज्यादातर जिन्दगी किसानी जीवन के इर्द –गिर्द घूमती है इसलिए यह आकस्मिक नहीं है कि लेखक ने पूरी तल्लीनता के साथ खेती से जुड़े कार्य ,शब्द व्यवहार को जीवंत रूप में उभारा है चाहे वह शब्द हरवाही ,डेढ़ीया ,बेंगही ,सवय्या ,ढेकुल ,ओड़ीचा ,लवनी,कटिया या ,बनि हो .यह सारे शब्द पूर्वी उत्तरप्रदेश के किसानी जीवन में रचे –बसे है .लेखक के पिता भी जमीनदारों के खेतों में हरवाही करते थे लेखक ने लिखा है , मेरे दादा –परदादा गाँव के ब्राह्मण जमीदारों के खेतों पर बधुआ मजदुर थे.गाँव के अन्य दलित भी उन्ही जमीदारों के यहाँ हरवाही करते थे ....किन्तु मेरे पिता जी को खानदानी हरवाही से कभी मुक्ति नहीं मिली .वे अकसर कहा करते थे कि यदि हरवाही छोड़ दूंगा तो ब्रह्महत्या का पाप लगेगा .अत्यंत धर्मान्ध होने के कारण वे हरवाही को अपना जन्मसिद्ध अधिकार एवं पवित्र कार्य समझते थे .मेरी माँ भी उनके साथ मजदूरी करती थी .इसी पीड़ा को एक दलित हरवाहा गा -गाकर व्यक्त करता था ....
हरिजन जाति सहे ,दुःख भारी हो
हरिजन जाति सहे, दुःख भारी
जेकर खेतवा दिन भर जोत ली
उहे देला गारी हो ,दुःख भारी
हरिजन जाति सहे दुःख भारी- इस पंक्ति में तत्कालीन दलितों की दयनीय स्थिति का पता चलता है.
साठ के दशक में पड़े अकाल से आक्रांत जन जीवन उसमें भी खासतौर से दलितों के लिए किसी नरक से कम नहीं था .खाद्यान्नों की कमी होने के कारण लोग भुखमरी के शिकार होने लगे थे .अनेक गांवों में विशेष रूप से दलित परिवार फाका करने लगे थे .लेखक की दादी हुक्का पीने की शौक़ीन थी इस कारण वह बोरसी में हमेशा आग की अंगीठी रखती थी इसीलिए दलित बस्ती की अनेक औरते चूल्हा जलाने के लिए आग मांगकर ले जाती थी .किन्तु अकाल के समय फाका करने के कारण चूल्हे नहीं जलते थे .जिस दिन कोई महिला आग मांगने नहीं आती तो लेखक की दादी दुखी होकर कहती कि लगता है आज उसके घर खाना नहीं पकेगा .इन अकाल के समय में दलितों को जमींदारों के खेतों पर बहुत ज्यादा श्रम करना पड़ता था .किन्तु कमाई बहुत कम हो पाती थी .इस दौरान सबसे बुरी हालत नाइयों ,धोबियों मुसहरों तथा नटों की होती थी .क्योंकि बाल काटने ,कपड़ा धोने के एवज में मजदूरी के रूप में इन्हें साल भर में रबी तथा खरीफ की फसलों से सिर्फ एक –एक केड़ा अर्थात फसलों का एक –एक बोझ मिलता था . किन्तु उस अकाल में धान के केड़े इन्हें नहीं मिले ,क्योंकि सारी फसले सूख गई थी .अत:इन परिवारों की बड़ी दुर्दशा होती थी.
लेखक के गाँव के कई लोग कलकत्ता ,आसनसोल के कोइला खदानों में मजूदरी और रिक्शा चलाने का कार्य करते थे ईधर लेखक भी अब पढ़ना लिखना सिख गया था .इसलिए स्वाभाविक था कि पूरी दलित बस्ती की महिलाएं लेखक से चिट्ठियां लिखवाती थी तथा उधर से आने वाली चिट्ठियां को पढवाती थी. लेखक के संवेदनशील मन में उन महिलाओं द्वारा पति को संबोधित कर के लिखवायी गई चिठ्ठी आज भी याद है कि किस प्रकार अपने पीड़ा ,गरीब,गैर मर्दों द्वारा परेशान करने की बात बड़ी दर्द के साथ लिखवाती थी .चिट्ठी की एक मजेदार घटना याद करते हुए लेखक ने लिखा है कि ‘सुभागिया हमारी बस्ती के रहने वाले जलंधर नामक बूढ़े दलित की जवान बेटी थी .वह बड़ी सुंदर थी .कुछ माह पूर्व उसका विवाह बिसराम नामक एक ऐसे युवक के साथ हुआ था .जो कलकत्ता के सियालदह स्टेशन के आस पास घोड़े की तरह खीचने वाला ठेला रिक्शा खिचता था .उसी के द्वारा अपने पत्नी के लिए लिखवाई गई चिट्ठी आती है जिसे पढ़ने का कार्य लेखक करता है पूरी चिट्ठी पढ़ने के बाद नीचे की लिखी दो पंक्तियाँ सुनते ही सुभागिया पर कहर टूट पड़ा और वह चिल्ला –चिल्ला कर रोने लगी .वहाँ भीड़ जमा हो जाती है .वास्तव में हुआ यह था कि नई –नई शादी हुई थी बिसराम को कलकत्ता में अपने क्षेत्र के किसी अन्य युवक ने एक प्यार मोहब्बत वाली दो लाइन की शायरी लिखकर दी थी .
लिखता हूँ खत खून से स्याही न समझना
मरता हूँ तेरी याद में जिन्दा मत समझना
यह शायरी सुनकर सुभागियाँ ने समझा उसके पति बिसराम अब जिन्दा नहीं है’
आत्मकथा में लेखक ने अपनी माँ से ज्यादा दादी का जिक्र किया है .रात में सोते समय दादी कहानीयां सुनाती तथा अपने बीते दिनों की बाते लेखक से साझा करती थी .दादी हर मुसीबत में लेखक की सहायता करती है चाहे वह बीमारी हो या घर से स्कूल के लिए फ़ीस मांगनी हो .दादी पड़ोस की महिलाओं के दुःख दर्द में हमेशा शामिल होती थी .उनके पास कई प्रकार की घरेलू औषधियों का ज्ञान था जिसके द्वारा तुरंत उपचार कर देती थी .उच्च जातियों द्वारा फैलायी गई भ्रान्तिया कि ज्यादा पढ़ने से आदमी पागल हो जाता है .इसको लेकर लेखक की दादी बड़ी चिंतित रहती थी कि कही तुलसी राम भी ज्यादा पढ़कर पागल न हो जाए .
लेखक अपनी कक्षा में हमेशा होनहार छात्र के रूप में जाना जाता था . जिससे उनके शिक्षक भी ज्यादातर खुश रहते थे .लेखक ने विद्यालय की एक बिडम्बना को याद करते हुए लिखा है कि पन्द्रह अगस्त और छब्बीस जनवरी पर हमलोग झंडे लेकर गली –गली घूमते थे. गाँधी,नेहरु,सरदार पटेल जिंदाबाद का नारा लगाते .इन दिनों खासतौर पर मास्टर साहब लोग भाषण में कहते कि गाँधी जी ने अछूतोद्धार के लिए लड़ा था तथा उन्होंने छुआछूत हटाया था ...यह बातें सुनकर मैं बड़ा खुश होता था किन्तु मुझे जब भी गाँधी जी याद आते अबिलम्ब मुंशी जी तथा मिसिर बाबा याद आने लगते जो प्यास लगने पर कुएं के पास फटकने नहीं देते थे .इसी कारण लेखक कभी –कभी पोखरे के पास जाकर चुपके से जलकुम्भी हटाकर पानी पीता था .
लेखक जब दसवीं में जाता है तो उसे आगे की कक्षा में पढ़ने का भय सताने लगता है क्योंकि दसवीं तक के बाद कोई गाँव में विद्यालय ही नहीं था .इसलिए लेखक दसवीं के बाद पढ़ने के लिए घर से आजमगढ़ भाग जाता है.वहाँ उसे कई प्रकार की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है.किन्तु कुछ अच्छे मित्र भी मिलते है जो लेखक की मदद करते है.लेखक वहाँ अम्बेडकर छात्रवास में रहकर अध्ययन करता.लेखक ने लिखा है अम्बेडकर छात्रावास का नाम देखकर मैंने पहली बार आंबेडकर का नाम पढ़ा या सुना .उसके बाद लेखक एक दिन घूमते हुए बनारस जाता है और संयोग से बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में घुमने चला जाता है और वही से प्रण करता है कि इस भव्य विश्वविद्यालय में मैं भी जरुर पढूंगा .और बारहवीं के बाद संघर्ष करके विश्वविद्यालय में दाखिला ले लेता है .फिर अनवरत संघर्ष करते हुए पीछे मुड़ कर नहीं देखता....
इस आत्मकथा में लेखक ने कई पात्रों को जिन्दा कर दिया है .चाहे वह गुस्सैल नग्गर चाचा हो या दरियादिली मुन्नेसर चाचा हो .आत्मकथा पढ़ने के बाद भारत के एक क्षेत्र विशेष की याद ताजा हो जाती है प्रेमचंद और फणीश्वर नाथ रेणु के यहाँ जो गाँव और लोकजीवन है
वह दोनों इस आत्मकथा में साथ साथ दिखाई देते है .इसीलिए यह आत्मकथा समाजशास्त्रियों के बीच भी उतनी ही लोकप्रिय है .जितना की साहित्यकारों के बीच .
इस आत्मकथा पर टिप्पणी करते हुए प्रख्यात कथाकर राजेन्द्र यादव ने लिखा है ‘दलितों के ढेर सारे लेखन के बीच मुर्दहिया इस लिए भी विशिष्ट है कि इसमें न कहीं बडबोलापन है न आक्रोश .सवर्णों को मुहँ भर –भर कर गालियाँ और रातोंरात दुनियाँ को बदल डालने का उतावलापन भी नहीं है ..बेहद धीरज और लगभग निर्विरोध भाव से उभरता हुआ तुलसी का असंतोष और संकल्प है .दूसरी तरफ आलोचक चौथीराम ने लिखा है कि तुलसी राम की आत्मकथा मुर्दहिया किंचित भिन्न है यहाँ वेदना तो भरपूर है लेकिन आक्रोश भरा विद्रोही स्वर बुद्ध की करुणा के संस्पर्श से शमित होकर मानवीय संवेदना का एक व्यापक परिप्रेक्ष्य प्रस्तुत करता है .अत: इस अर्थ में मुर्दहिया रोती हुई संवेदनाओं की आत्मकथा है .
लेखक - जितेन्द्र यादव

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