सिकुड़ता हुआ शिक्षा तंत्र
अभी पिछले साल राजस्थान सरकार द्वारा सैकड़ों प्राथमिक विद्यालयों को बंद कर दिया गया | जिसे शासकीय शब्दावली में विलय या मर्ज कहा गया | | इस विलय का शर्त यह था कि जिस विद्यालय में तीस बच्चों से कम संख्या है वह विद्यालय बंद हो जाएगा | इस महाविलय के दौरान जो विद्यालय बंद हुए उन विद्यालयों के बच्चों को पास के दूसरे विद्यालय में भेज दिया गया | वह बच्चे जो अपने पास के विद्यालय में पढ़ रहे थे उन्हें अब दूर के किसी अजनबी विद्यालय में विस्थापित कर दिया गया है | जहाँ पर बच्चे और शिक्षक दोनों अजनबीपन और अलगावबोध का शिकार हुए है | क्योंकि जिस विद्यालय में बच्चे स्वाभिमान से पढ़ते थे, शिक्षक आत्मसम्मान के साथ पढ़ाते थे किन्तु दूसरे विद्यालय में जाने के बाद वहाँ के शिक्षक और बच्चों के तिरस्कार और हिकारत भरी नजर देखने के कारण, विस्थापित हुए विद्यालय के बच्चे और शिक्षक के स्वाभिमान और आत्मसम्मान दोनों पर चोट पंहुचा है |
सरकार का यह तर्क कि बच्चे कम थे और संसाधनों की बर्बादी हो रही थी इस कारण विद्यालय को एक दूसरे में विलय करना पड़ा | यह वास्तविक बात है कि बच्चे विद्यालय में कम थे किन्तु सरकार को इस विषय पर सोचना चाहिए कि बच्चे विद्यालय में कम थे लेकिन देश में नहीं |उन कारणों की खोजबीन करनी चाहिए थी जिसके कारण बच्चों के अभिवावक सरकारी विद्यालयों में पढ़ाने से गुरेज कर रहे है | और निजी विद्यालयों में अपनी कमाई की मोटी रकम देकर पढ़ा रहे है और साथ ही निजी विद्यालय के बेलगाम निरकुंशता ,मनमानेपन का शिकार भी हो रहे है | सरकारी विद्यालयों की गुणवत्ता संदेह के घेरे में है क्योंकि ज्यादातर बच्चे ठीक –ठीक पढ़ना -लिखना भी नहीं सीख पा रहे है | इस कारण से सरकारी विद्यालयों की साख और विश्वसनीयता तेजी से गिरी है | इसके पीछे जो मुख्य कारण दिखाई दे रहे है वह है सरकार की उदासीनता और इच्छा शक्ति की कमी क्योंकि सरकार और नौकरशाही के बच्चे इन विद्यालयों में नहीं पढ़ते | इसलिए वे उतने गंभीर और चिंतित नजर नहीं आते जितना की उन्हें होना चाहिए | इधर के दशकों में शायद ही कोई बड़ा नेता प्राथमिक विद्यालयों में दी जा रही शिक्षा को मुद्दा बनाया हो और उसके लिए गंभीर प्रयास किया हो | मजे की बात तो यह है कि अब विद्यालयी शिक्षा जैसे गंभीर मुद्दे भी चुनावी मुद्दे से गायब है | नेतागण बड़े –बड़े मेडिकल कालेज .आई आई टी ,प्रबन्धन कालेज खोलने के वादे तो करते है लेकिन विद्यालयी शिक्षा के सुधार के लिए कोई ठोस खाका या योजना दिखाई नहीं पड़ती |
एक तरफ सरकार मजबूर होकर बच्चों के कमी का हवाला देकर विद्यालयों को बंद कर रही तो दूसरी तरफ निजी विद्यालय के नाम पर खोटे सिक्के भी चल रहे है | भारत के पूरे इतिहास में सरकारी शिक्षा की साख इतना नहीं गिरी होगी जितना की अब गिरी है | सरकार एक तरफ तो गरीबों के विकास की बात जरुर करती है किन्तु गरीबों के बच्चों के लिए बेहतर शिक्षा की व्यवस्था नहीं करना चाहती | क्योंकि सरकार जानती है जब वे लोग पढ़ लेंगे तो एक संघर्ष और टकराहट का दौर शरू हो जाएगा क्योंकि वे अपनी उचित प्रतिनिधित्व की मांग करने लगेंगे | जबकि वर्तमान की शिक्षा व्यवस्था में पढ़ने वाला प्रत्येक छात्र स्वत: अयोग्य और असफल मान लेता है | शिक्षा व्यवस्था को अयोग्य मानने के बजाय खुद को अयोग्य मानकर पढाई छोड़कर बड़े शहरों के कल-कारखाने में जीविकोपार्जन की तलाश में निकल जाता है|
ऐसा नहीं है कि सरकार के सभी योजना विफल है | सरकार के नयोदय विद्यालय और केन्द्रीय विद्यालयों में प्रवेश के लिए खूब प्रयास किए जाते है क्योंकि उसमें दी जाने वाली शिक्षा बेहतर मानी जाती है | तो क्या इस तरह की बेहतर शिक्षा राज्य अपने प्रत्येक नागरिक को उपलब्ध नही करा सकता|
आज शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण दायित्व से सरकार पीछे हट रही है और उसे दिन –प्रतिदिन बाजार और निजी हाथों में सौपती जा रही है | तो क्या सरकार इतना असहाय और लाचार हो गयी है कि अपने प्रत्येक नागरिक को शिक्षा जैसे बुनियादी अधिकार को भी सुनिश्चित नहीं कर पा रही है | अभी पिछले दिनों एक सभा में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से एक सात साल बच्चा सवाल पूछ लिया जिसका जवाब देने में मुख्यमंत्री मुश्किल में पड़ गए | वह सवाल भी कुछ और नहीं बल्कि शिक्षा व्यवस्था को लेकर था | लड़के ने कहा ,’क्या कारण है कि आज सरकारी विद्यालयों में मंत्री ,डाक्टर ,इंजीनियर, यहाँ तक कि खुद शिक्षक अपने बच्चे को नहीं पढ़ाना चाहते | हम बच्चे सरकारी विद्यालयों में पढ़ने वाले हीन भावना के शिकार हो जाते है | यदि मैं सयोंग से प्रधानमंत्री बन गया तो निजी विद्यालयों को बंद करा दूंगा |’ यदि आज इतना छोटा बच्चा शिक्षा को लेकर इतना गंभीर सवाल कर रहा है तो देश के नेताओं और बुद्धजीवीयों को शर्म से झुक जाना चाहिए | शिक्षा के बहुपरतिय प्रणाली को देखकर गरीब ,निर्दोष बच्चे भी मन ही मन कोसते होंगे कि एक तरफ और बच्चों का सूट –बूट ,टाई और चमचमाते जुते के साथ बस से स्कूल जाना और दूसरी तरफ उन्हें शिक्षक और संसाधन रहित विद्यालयों में मज़बूरी वश पढ़ने जाना और शिक्षकों के ताने सुनना कि भोजन और छात्रवृत्ति के लिए पढ़ने आता है | यह हमारी शिक्षा व्यवस्था का कितना बड़ा फासला है | उस फासले को पाटने के बजाय सरकार की नीतियाँ उसे और बढ़ा रही है |
जरा आप सोचिये कि जिस विद्यालय में आपने प्राथमिक पढाई की हो और वह विद्यालय बंद हो जाए तो आप को कैसा लगेगा | प्रत्येक व्यक्ति यह चाहता है वह जिस विद्यालय में पढ़ा हो दिन –प्रतिदिन तरक्की करे ताकि वह गर्व से दूसरे को बता सके कि यह अमुक विद्यालय जो दिखाई दे रहा है इसमें मैंने पढाई किया है | किन्तु आज इसका उलट हो रहा है आप जिस विद्यालय में पढ़े थे वह धुल फांक रहा है या सरकार का स्टोररूम बन गया है | रास्ते से गुजरते वक्त न जाने कितने धूल खाते हुए ऐसे विद्यालय मिल जाते है जिन्हें महाविलय ने संग्रहालय का रूप दे दिया है | क्या सरकार अपने प्रत्येक नागरिक को एक समान समुचित शिक्षा का व्यवस्था कर पायेगी शिक्षा के भविष्य को लेकर कोई ठोस खाका बना पायेगी या इसी तरह शिक्षा बाजार के रास्ते से होकर कहीं विलीन हो जाएगी | यह आज के दौर का सबसे गंभीर सवाल है जिससे टकराए बगैर आगे नहीं बढ़ा जा सकता |
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