"कबीर एक अंतर्कथा "


कबीर ! तुम चले गये कोई दुःख नही हमें
तुम मगहर में मरे या काशी कोई लेना देना नही
तुमने सगुण अपनाया या निर्गुण कोई सवाल नही है मुझे
विधवा ब्राह्मणी ने जन्म दिया या नीरू नीमा जुलाहा कोई तकरार नही है
तुमने सधुक्कड़ी अपनाया या ब्रज कोई शिकायत नही है मुझे
मेरी अंतर्कथा सिर्फ और सिर्फ तुमसे है ,
कबीर ! समय बारूद से भी ज्यादा विषैला हो गया है
और तुम्हरा चेहरा तो मेरे सामने रखे डस्टबिन से भी ज्यादा
मैला हो गया है ,
कबीर ! मै चलना चाहता हूँ  दिखाए गये तुम्हारे रास्ते पर
लेकिन पाखंडवाद ने उसको लील लिया है ,
कबीर ! सुना की तुम विद्यालय नही गये थे
लेकिन मैंने तुम्हें विश्वविद्यालय में पढ़ा
ताकि हासिल कर सकू डिग्री
तुम्हारी वाणी पूरे उत्तर भारत में गुजती थी
आज मेरी कक्षा में पीछे बैठे लड़के को नही सुनाई देती
क्योकि उसकी निगाह अपनी मोबाईल के किसी तस्वीर पर है
कबीर ! अब हर रोज यहा दंगा होता है
जिसका नंगा नाच मेरे देश के घडीयालू आंसू बहाने वाले नेता
गिरगिट की तरह चेहरा बदलकर उस पर  राजनीतिक पाशा फेकते है
उस दंगे में मै भी गया था अपने राम की तरफ से
मेरे सफ़ेद शर्ट पर लगी खून की दाग अभी जिन्दा है
कबीर ! तुम सोचते होगे की अब तो जातिव्यवस्था मिट गई होगी
लेकिन मेरे देश के नेताओं की करतूत से उसकी जड़
और भी गहरी हो गई है ,
हुआ है सिर्फ एक बदलाव जिसको तुम शुद्र कहते थे
अब वे दलित हो गये
कबीर !तुम जिस कनक कामिनी की किये थे निंदा
उसी के कारण आज मैं जिन्दा हूँ
बाजारवाद की इस दौर में वेशायालय से निकलकर
मेरे बिस्तर में चिपक गई है उसके जिस्म का आयतन आँखों के आकार
में अब भी दिख रहा है ,
कबीर ! मेरे देश में मनु के एक श्लोक के सामने
तुम्हारे सारे दोहे अर्थहीन और बेजान लगते है
तुलसी की एक चौपाई के आगे तुम्हारा सब शब्द फीके लगते है
कबीर ! मेरे टूटे हुए मकान से भी ज्यादा कीमती मेरा मंदिर है
और उसमे बैठे मुस्टंडे बाबा मेरे प्राण से भी ज्यादा प्यारा
कबीर !अब बहुत पीड़ा हो रही है मै तुमसे बात करने के लायक नही
माफ़ करना मेरे यार दोस्त कबीर |

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