भारत में पुस्तक पढ़ने की संस्कृति -

                               
    हमारे देश की साक्षरता एक तरफ भले बढ़ रही हो लेकिन हमारी आज की पीढ़ी में पुस्तक पढ़ने की प्रवृत्ति सिरे से ख़ारिज होती जा रही है | वह अपने विषय के अलावा और किताब को विषयांतर कह कर नकार देता है | वही दूसरी तरफ तरह –तरह के स्मार्ट फोन खरीदना और उसके साथ समय की फिजूल बर्बादी में अपनी महानता महसूस करता है | अपने पैसे से किताब खरीदना तो दूर नगर और कस्बो में सरकार और स्वयं सेवी संगठनों द्वारा खोले गए पुस्तकालयों में जाने के लिए फुर्सत नहीं होती | कई पुस्तकालय वाले बताते है कि कितना प्रयास करने के बावजूद भी लोग पढ़ने के लिए उत्सुक नहीं हो पाते जितना कि उन्हें होना चाहिए | किताब पढ़ने की यह दरिद्र स्थिति देखने के बाद लोग भले कहे कि अब टेक्नोलॉजी का जमाना है लोग लैपटॉप और स्मार्ट फोन में ई बुक पढ़ लेते है लेकिन वही दूसरी तरफ जब बिदेशी नागरिक हमारे देश में आते है चाहे वह पर्यटन स्थल हो या बस स्टैंड हो रेलवे स्टेशन हो चाहे हवाई अड्डा हो उनके हाथों में किताब पढ़ते वक्त सहज देखा जा सकता है | जबकि ठीक उन्ही जगहों पर उनके बगल में ज्यादातर भारतीय लोग बैठकर मोबाइल में गेम खेलते या दूर के किसी टाइम पास मित्र से फेसबुक या व्हाट सेप पर टिपटीपाते दीखते है |
           मजे कि बात यह है कि ये सारे उपकरण मोबाइल ,लैपटॉप ,फेसबुक ,ट्विटर ,व्हाट सेप उन्ही की देन है | फिर भी वे इसकी सीमाएं औए संभावनाएं को अच्छी तरह जानते है | और पुस्तक के भी सीमाओं और संभावनाओं को जानते है | एक कालेज के प्राध्यापक ने बताया कि हमारे यहाँ करीब चालीस प्राध्यापक है लेकिन उनके घरों में आप देखेंगे तो किताब के नाम पर आप निराश हो जायेंगे जबकि सरकार इन्हें इफरात वेतन देती है | उस वेतन का उपयोग सिर्फ गाड़ी और बंगले बदलने के काम आता है | उन्होंने यह भी कहा कि पुस्तकालय में किताबे मंगवाते है लेकिन पाठक के अभाव में पुस्तके आलमारी के किसी कोना में अपने नियति पर आसूं बहाती है |
            इस तरह पुस्तक पढ़ने के अभ्यास के अभाव में जो छात्र बाहर निकलते है तो उनका ज्ञान काफी एकांगी औए संकीर्णतावादी होता है | ज्ञान के इसी संकीर्णता के कारण वे हवा –हवाई बातों पर विश्वास कर लेते है और जिसका फायदा गाहे –बगाहे अराजक और असामाजिक तत्व बड़े असानी से उठाते है | एक तथाकथित उच्च जाति के मित्र ने बताया कि जब वह कालेज में पढता था तो दलित को लेकर उसके मन में कई पूर्वाग्रह थे इसी कारण मैडम से तीखी बहस हो जाती थी लेकिन जब उन्होंने दलित आत्मकथा जूठन पढ़ने को दिया उसके बाद मेरा दृष्टीकोण ही बदल गया | किन्तु उस जैसे न जाने कितने और मित्र अपने पूर्वाग्रह लेकर कालेज में प्रवेश करते है और वही पूर्वग्रह लिए प्रस्थान भी कर जाते है जिनका आगे चल के दकियानूसी और समाज में नफरत भरी बात सुनकर दूसरे लोग शिक्षा की दुहाई देने लगते है |
              देखा जाय तो हम भारतीय मौखिक परम्परा में ज्यादा विश्वास और रूचि लेते है | पढ़ना एक दुष्कर और कठिन प्रक्रिया लगती है और उससे भी ज्यादा कठिन लिखने का कार्य मानते है | कई जगहों पर लोग विशेष उत्सव पर पुस्तक पर भेट करते है और उसमें गर्व महसूस करते है | अपने जीवनानुभव से कहे तो बारहवी से पहले नहीं लगता था कि प्रेमचन्द ने नमक का दरोगा और ईदगाह कहानी के अलावा भी कुछ लिखा है | या यह कहे कि उस समय यह नहीं पता था कि विषय की कुछ गाइडनुमा किताबों के अलावा भी बहुत सारे ज्ञान –विज्ञान की किताबें होती है | इसके पीछे कारण था पुस्तकालय का अभाव जो ज्ञान को विस्तृत और नया आयाम देती है |
Ø हवाई अड्डे से लिया गया तस्वीर जो प्रेरित किया मुझे ,यहाँ एक परिवार के तीन सदस्य एकाग्रचित्त  होकर पुस्तक पढ़ रहे है .
 लोगों के बीच पुस्तक पढ़ने की रूचि को बढ़ाने के लिए सरकार को प्रत्येक पंचायत स्तर पर एक समृद्ध पुस्तकालय खुलवाना होगा | उसमें बच्चे से लेकर उच्च स्तर तक की किताब होनी चाहिये | साथ ही उस पर निरंतर ध्यान रखना होगा | इस मुहीम में भारत ज्ञान विज्ञान समिति जैसे कुछ प्रकाशन कार्य कर रहे है किन्तु इस मुहीम को गाँव स्तर तक व्यापक बनाना बाकि है | महंगी पुस्तके भी इस रास्ते में रुकावट है इस लिए सरकार को खुद के प्रकाशन द्वारा अच्छी पुस्तकों को सस्ते दाम में उपलब्ध करवाना होगा | यदि वास्तव में भारत को आगे बढ़ाना है तो हम पुस्तकों से परिचित करवा कर एक माहौल देकर ही अपनी पीढ़ी और आने वाली पीढ़ी को सही दिशा दे सकते है |
                इसके लिए विद्यालय और शिक्षक भी कम दोषी नहीं है .क्योंकि वे पाठ्यपुस्तक से बाहर जाने और ज्ञान के भूख को पैदा करने में असमर्थ है | पढ़ाते वक्त जब शिक्षक किसी पुस्तक का उदाहरण देते है तो छात्र में स्वत: उक्त पुस्तक के प्रति जिज्ञासा और रूचि बढ़ती है | किन्तु वे खुद इस समस्या से जूझ रहे है तो बच्चों को किस हैसियत से सुझाव दे पाएंगे | मुझे याद है मेरे एक शिक्षक पढ़ाते वक्त दो एक बार राग दरबारी उपन्यास का उदाहरण दिए थे जो मेरे अवचेतन में वह किताब रह गई और कुछ समय बाद एक पुस्तक मेले में वह किताब दिख गई और मैंने बेखटके वह किताब खरीद ली थी | उससे पहले उस किताब के बारे में थोड़ी भी जानकारी नहीं थी |
            आज तेजी से बदलती दुनिया जिसमें बाजार निर्णायक की भूमिका में आ गया | उसकी प्राथमिकता में वही चीज है जिसमें मुनाफा कई गुना हो वह अपने फायदे के आधार पर लोगों की रुचियाँ विकृत करके उपभोक्ता बनाना चाहता है न कि पाठक तैयार करना | इस लिए अपनी प्राथमिकता खुद तय करनी होगी अर्थात किताबों की दुनिया से गुजरकर ही ज्ञान के आर –पार नापा जा सकता है |


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