आज का भारत और भीम राव अम्बेडकर

                            
        किसी भी देश के सामाजिक ,आर्थिक ,राजनीतिक निर्माण में वहाँ के सभी नागरिक का अवदान माना जाता है . किन्तु कुछ नागरिक सामाजिक बदलाव की प्रबल इच्छाशक्ति और क्रांतिकारी विचारों के कारण नायक बनने की योग्यता हासिल कर लेता है . तथा आने वाली पीढ़ी गर्व के साथ उनकी महानता को स्वीकार करती है . उस महानता के क्रम में आज के समय में सबसे बड़ा नाम डा.बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर का है . इस पर्चे में डा. अम्बेडकर के सभी योगदान को बता पाना मेरे लिए असम्भव होगा किन्तु उनके योगदान के कुछ पहलू पर ध्यान दिलाने का प्रयास करूँगा . कबीर ,रैदास ,ज्योतिवा राव फूले के बाद किसी शोषित वर्ग से सामाजिक बदलाव की भावना से प्रेरित आता है तो वह है डा. अम्बेडकर . डा. अम्बेडकर अपने समय के प्रतिष्ठित कोलम्बिया विश्वविद्यालय और लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स से उच्च डिग्रियां हासिल की थी . मानवीय अधिकारों से वंचित कर दिए गए समाज से आने के कारण अम्बेडकर को अपने बाल्यकाल में ही उन तमाम अत्याचार और पीड़ा को सहना पड़ा था जिसका एक मात्र दोष उस जाति में जन्म लेना था . इन्ही अत्याचार ,शोषण और पीड़ा को झेलने के कारण अम्बेडकर का मन विद्रोही मन बन चूका था और वह विद्रोही मन उनके व्यक्तित्व का बड़ा हिस्सा बन चूका था . जो आजीवन उनके जीवन के साथ जुड़ा रहा है .
      आज हमारी पीढ़ी के सामने सबसे बड़ी समस्या यह है कि हम उन्हें कितना जान पाए है या गाँधी ,नेहरु ,मालवीय जी की तरह उन्हें किसी विद्यालय के पाठ्यक्रम में न लगाना भी कई संकेत करते है . आज यदि अम्बेडकर सबसे ज्यादा प्रासंगिक है तो उससे ज्यादा भ्रान्ति के भी शिकार है . और यह भ्रान्ति जान बुझकर फैलाया गया है और इन्ही भ्रान्ति के कारण उनके समस्त योगदान और कार्य को दलित समाज में भी जाति विशेष के हित से जोड़कर  सीमित दायरे में देखा जाता है . यह बताकर उनके समस्त संघर्ष जो कि सारे शोषित पीड़ित समाज को मानवीय गरिमा का अधिकार दिलाने और स्वतन्त्रता ,समानता ,बंधुत्व को झुठलाने का प्रयास है . अम्बेडकर से पहले जितने भी समाज सुधारक का तमगा लिए हुए समाज सुधार की बात करते थे वे समस्या की जड़ में जाने के बजाय यथास्थिति व वर्णाश्रम व्यवस्था को बनाए रखते हुए हृदय परिवर्तन की बात करते थे . अम्बेडकर पहले व्यक्ति है जो अपने विद्वता और तर्कशक्ति के द्वारा समस्या की जड़ को पहचानते है और साहस करके मनुष्य मनुष्य में भेदभाव छुवाछुत को दार्शनिक आधार देने वाली मनुस्मृति का सार्वजनिक दहन करते है . हम सोच सकते है उस समय की स्थिति क्या रही होगी . वह तालाब जहाँ पर पशु –पक्षी जानवर तक को पानी पीने की स्वतंत्रता थी किन्तु दलित को पानी मात्र लेने से पानी अपवित्र हो जाता था . अम्बेडकर ने पुरे दलित समुदाय को इकट्ठा करके वहाँ ले जाते है और पानी भरने का आदेश देते है . वास्तव में वह दिन भले कुछ लोगों के लिए ब्रिटिश गुलामी का दिन रहा हो लेकिन दलितों ने पहली बार आजादी और स्वाभिमान का स्वाद चखा होगा . वह आजादी भारत की आजादी से कम नहीं रही होगी . दूसरा सबसे बड़ा आन्दोलन मंदिर में दलितों का प्रवेश दिलाना था यह आन्दोलन मंदिर में पूजा –पाठ करने का आन्दोलन नहीं था बल्कि उनकी अस्मिता और आत्मसम्मान की लड़ाई थी कि जहाँ और व्यक्ति जा सकते है तो सिर्फ दलित को दलित होने के आधार पर कैसे मना किया जा सकता है .
  अम्बेडकर जानते थे कि इस अमानवीय व्यवहार ,असमानता के पीछे वह हिन्दू धर्म है जो इस भेदभाव को जायज ठहराता है . इसी वजह से उनका पूरा आक्रोश हिन्दू धर्म के खिलाफ निकलता रहा अंततः जब उन्हें पता चल गया कि इस धर्म की बुनियाद ही असमानता और भेदभाव पर टिकी है तो फिर उन्होंने कहा ‘मैं भले हिन्दू धर्म में पैदा हुआ लेकिन हिन्दू धर्म में मरना नहीं चाहता’ और इसी संकल्प के साथ उन्होंने बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया . जो बुद्ध के वैज्ञानिक तार्किक विचारों के कारण जाना जाता है . अम्बेडकर ने कहा था ‘एक अछूत ,अछूत पैदा होता है अछूत जीता है और अछूत रहकर मर जाता है.’ इनके इस कथन से महराष्ट्र के पेशवाओं का शासन याद दिलाता है जब दलित बर्बरता अपने चरम पर पहुच चुकी थी . उनके शासनकाल में दलित जाति के लोग कमर में हड्डी बाधकर चलते थे ताकि उनके चलने के बाद रास्ता पवित्र हो गले में हाड़ी बाधते थे ताकि रास्ते में थूककर उसे अपवित्र न कर दे . काली रस्सी बाधकर चलते थे ताकि दूसरा उन्हें छूने से बच जाय . इतना के बावजूद कही विद्रोह पैदा नहीं हुआ तो इसका मतलब यही है कि दलित इसे अपनी नियति और भाग्य मानकर चुपचाप सहे जा रहे थे . अम्बेडकर कहते थे कि शोषितों को सिर्फ एहसास भी दिला दे की तुम्हारा शोषण हो रहा तो वे विद्रोह करना सिख जायेंगे . इस नियतिवाद को चुनौती देने वाला ,हिन्दू धर्म की पोल खोलने वाला , ब्राह्मणवाद से टकराने वाला ,तथाकथित सुधारको को मुहतोड़ जवाब देने वाला अम्बेडकर आए तो पूरे  शोषित ,पीड़ित समाज में हलचल पैदा हुआ . तब उन्हें लगा सदियों से जिस नायक की तलाश थी वह नायक आ चूका है फिर सभी शोषितों ने अम्बेडकर के मार्गदर्शन में मानवीय अधिकार की लड़ाई छेड़ दी .उस लड़ाई को उच्चवर्ग कई चश्मे से देखता रहा है . और वह वर्ग सोचता है कि उसके वर्चस्व और विशेषाधिकार पर किसी तरह का आंच न आए इसी कारण डा. अम्बेडकर की छबि को संकीर्णतावादी रूप में पेश करके उनके सम्पूर्ण संघर्ष और योगदान को भ्रमित करने का प्रयास किया गया .
     आम्बेडकर जानते थे कि जब तक हाशिये का समाज मुख्यधारा में शामिल नहीं होगा तब तक उसकी प्रगति नहीं होगी और जब उसकी प्रगति नहीं होगी तब तक देश की प्रगति का सपना भी अधुरा रह जाएगा . इसी तरह का चिन्तन और विचार स्त्रियों के बारे में भी था वह स्त्री चाहे दलित हो या सवर्ण सबकी समस्या एक जैसी है इसीलिए उन्होंने कानून मंत्री की हैसियत से संसद में हिन्दू कोड बिल का प्रस्ताव लाया . आम्बेडकर ने देश की स्त्रियों की वस्तुगत स्थिति और उनके शोषण के आधारों को इस तरह से समझा था जिस तरह से किसी ने नहीं समझा था . उन्होंने माना कि इस देश की स्त्रियों की समस्या का मूल कारण है -ज्ञान और सम्पत्ति पर उनका कोई अधिकार नहीं होना . अम्बेडकर का कहना था कि किसी भी देश के उन्नति देखना है तो वहाँ की स्त्री का स्थिति से पता लगाया जा सकता .
   भारत के इतिहास में आम्बेडकर ने ही पहली बार महिला कामगारों के प्रसूति अवकाश का मामला उठाया उनका मानना था कि महिलाओं को प्रसूति अवकाश देना और पूरा वेतन प्रदान करना राष्ट्रीय हित में उठाया जाने वाला एक महत्वपूर्ण कदम है . आधुनिक भारत में स्त्रियों को शिक्षा का अधिकार तो मिला मगर सम्पत्ति के अधिकार से फिर भी उन्हें वंचित रखा गया . आम्बेडकर इस बात को अच्छी तरह से समझ गए थे कि स्त्रियों का सम्पति हीन होना ही उनके साथ असमान व्यवहार और शोषण का कारण है .इसलिए उन्होंने हिन्दू कोड बिल में स्त्रियों को सीधे और बराबर अधिकार देने की वकालत करके इस मामले में ऐतिहासिक पहलकदमी की थी .उन्होंने लडकियों के दत्तक अधिकार का मसला भी हिन्दू कोड बिल में उठाया है . इसके अलावा उन्होंने हिन्दू कोड बिल में स्त्रियों के लिए विवाह की आजादी ,तलाक ,भरण –पोषण के अधिकारों की भी वकालत की थी . स्त्री विकास से जुड़े अनेक मामलों के अलावा महिला आरक्षण की भी वकालत की थी . हिन्दू कोड बिल से स्त्रियों को समान सम्पत्ति अधिकार दिए जाने के मामले को दरकिनार किए जाने पर ही उन्होंने तत्कालीन नेहरु कैबिनेट से इस्तीफा दे दिया था . उनका यह कदम दर्शाता है कि वह इस मामले में कितने गंभीर थे . बाद में  उन कानूनों को टुकड़े –टुकड़े में लागू किया गया . आज जो शिक्षा का अधिकार कानून आया है इसका सपना अम्बेडकर उसी समय देख रहे थे .
   किन्तु बिडम्बना यह कि आज भी अम्बेडकर के बारे कुछ समुदाय में केवल इस रूप में जाना जाता है कि उन्होंने आरक्षण व्यवस्था लागू किया था . जिसका भड़ास वे गाहे –बगाहे अम्बेडकर की मूर्ति को  चप्पल की माला पहनाकर या मूर्ति तोड़ करते रहते है . अम्बेडकर कोई काल कल्पित देवता नहीं थे जिनके बारे किसी भी तरह की कोई कल्पना करे उसे मान्यता दे दी जाय .  अम्बेडकर का सारा वांगमय उपलब्ध है हमें उनके वांगमय का अध्ययन करके उनसे गुजरकर ही कोई आलोचना या निर्णय का अधिकार होना चाहिए .
   डा अम्बेडकर जितने प्रखर वक्ता थे उतने ही गम्भीर अध्येता भी . वे जब विदेश से पढाई करके लौटे रहे थे तो उनके पास कई बक्से सिर्फ किताब से भरे पड़े थे . सभी धर्मों के बारे उन्होंने गहन अध्ययन किया था ,हिन्दू धर्म का तो शायद कोई ग्रन्थ हो जिसे पढ़कर टिका न किया हो आज भले स्वयं सेवक संघ अम्बेडकर को अधिग्रहित करने का प्रयास करे लेकिन उस अन्तर्विरोध को नहीं छिपाया जा सकता . जिसमें एक तरफ अम्बेडकर का गीता इत्यादि पुस्तकों की कटु आलोचना है दूसरी तरफ उसी ग्रन्थ को संघ विद्यालयों में पढ़ाने की बात करता है .

  निसंकोच कहा जा सकता है जब तक भारत में सामाजिक न्याय के सवाल मुह बाए खड़े रहेंगे तब तक अम्बेडकर याद आते रहंगे ,हंसाते रहेंगे ,रुलाते रहेंगे ,कई आँखों में किरकिराते रहेंगे . अम्बेडकर का शोषितों के लिए दिया गया मन्त्र को उद्धृत करके अपनी बात खत्म करते है . शिक्षित बनो ,संगठित रहो ,संघर्ष करो .

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