मानवता का रक्षक कौन धर्म या साहित्य ? -जितेन्द्र यादव

                 
    यदि इतिहास के झरोखे से देखा जाए तो धर्म और साहित्य कभी एक दूसरे के पूरक तो कभी एक दूसरे के प्रतिद्वंद्वी होते हुए आज दोनों दो किनारों पर खड़े है .दुनिया का लगभग हरेक साहित्य धर्म की सवारी करके आगे बढ़ा है .हिंदी साहित्य का ही आदिकाल ,भक्तिकाल के कई कवियों का उद्देश्य ईश्वर के प्रति प्रेम ,लगाव ,भक्ति रहा है .कई बार बड़े –बड़े आलोचक भी भ्रान्ति और असमंजस की स्थिति में हो जाते है कि इसे धार्मिक साहित्य कहे या सिर्फ साहित्य कहें .यह स्थिति रामचन्द्र शुक्ल जैसे आलोचक के सामने भी पैदा हुई थी कि किसको साहित्य की श्रेणी में रखे किसको धार्मिक साहित्य की श्रेणी में, क्योंकि जैन साहित्य को इन्होने धार्मिक साहित्य कहकर ख़ारिज कर दिया था .दूसरी तरफ तुलसी ,सूर जैसे हिन्दू कवियों को साहित्य के शीर्ष स्थान पर स्थापित किया .उनका मानना था कि जैन कवियों की रचनाओं में कोरा उपदेश है किन्तु हिन्दू भक्त कवियों की रचनाओं में जीवन का दर्शन ,रसात्मकता ,भावनात्मकता भी है जो उन्हें जैन कवियों से अलग करता है .
     बहरहाल मैं साहित्य के उत्थान काल को दिखाने का प्रयास कर रहा हूँ कि शुरुआत में धर्म और साहित्य आपस में किस तरह घुले –मिले हुए थे .धर्म और साहित्य को अलग करना कई बार टेढ़ी खीर नजर आता है .इस माप दंड पर संस्कृत साहित्य को देखे तो उसका साहित्य रामायण ,महाभारत, पुराण कथासरित्सागर के इर्द –गिर्द ही सारी रचनाओं के कथानक बुने गए है .इन्ही दो आख्यानों से प्रभावित हिंदी साहित्य का भक्तिकाल ,रीतिकाल का साहित्य रहा है .कला माध्यम में सिर्फ साहित्य ही नही बल्कि और कलाएं भी धर्म को आधार बनाकर आगे बढ़ी है .हिंदी सिनेमा का उदय दादा साहब फाल्के के द्वारा होता है जिनकी अधिकांश फिल्म धार्मिक आख्यानों की कथा कहती है .चित्रकारी और मूर्तिकला भी धर्म से जुड़ी रही है .यहाँ तक की राजा रवि वर्मा ने हिन्दू देवी –देवताओं की तस्वीर बनाने से अपनी कला की शुरुआत की थी . इस तरह देखा जाए तो अधिकांश कलाओं की शुरुआत धार्मिक कथाओं ,आख्यानों से प्रेरित रहा है .
   धर्म और साहित्य का सम्बन्ध अन्योन्याश्रित था .भक्ति काल तक ज्यादातर कवियों का उद्देश्य अपने आराध्य के प्रति साहित्य के द्वारा अपने भक्ति को दर्शाना था .वही रीतिकाल तक आते –आते भक्ति एक माध्यम भर रह जाती है .अपितु उसके बहाने से कवि अपने श्रृंगार की दुनिया का कथा कहने लगते है .कृष्ण और राधा को आधार बनाकर श्रृंगारिक रचनाओं का पहाड़ खड़ा कर दिया जाता है .यहाँ देखने से यह प्रतीत होता है कि साहित्य और धर्म का रिश्ता धीरे –धीरे अलगाने लगता है .साहित्य और धर्म को दो किनारों पर लाने का श्रेय नवजागरण काल को है जिनमें सभी चीजों का मूल्यांकन एक नए सिरे से शुरू होता है .यूरोप में भी पोप की सत्ता से आतंकित समाज और साहित्यकार साहित्य और धर्म के रिश्ते को अलग तरीके से देखने लगता है .नवजागरण काल में वैज्ञानिक दृष्टिकोण ,तर्कवादी वादी नजरियाँ ने धर्म की आस्था को तर्कों से खंडित करना शुरू कर दिया .अब साहित्य का विषय धर्म ,ईश्वर ,आत्मा ,परमात्मा नहीं बल्कि मानवीय मूल्यों, जीवन संघर्षो के बारे में कहना शुरू करता है .यानी पहले जहाँ सहित्य के केंद्र में ईश्वर था वही अब साहित्य का केंद्र मनुष्य हो गया .साहित्य मनुष्य के सुख –दुःख ,रोजमर्रा की कहानी कहना प्रारम्भ किया .
   हिंदी साहित्य में जिसे हम आधुनिक काल कहते है वह पूरी तरह से मनुष्यसत्ता और ईश्वरसत्ता के विच्छेद का युग है .इस युग में रचनाकारों के विषय का केंद्र मनुष्य ,देशप्रेम ,और प्रकृति है .इससे एक कदम आगे बढ़ते हुए प्रगतिवाद में तो पूरा का पूरा धर्म और ईश्वर विरोधी साहित्य रचा गया .जिसका मानना ही था कि शोषण और अन्याय का कारण धर्म और ईश्वर है .इस तरह देखे तो आज का समकालीन साहित्य धर्म से अपने को बिलकुल अलगाते हुए स्वतंत्र और आत्मनिर्भर खड़ा है .उसके पास ईश्वर वंदना के अलावा दुनिया के तमाम विषय है जिसे वह अपने साहित्य का माध्यम बनाता है .आज के साहित्य के लिए धर्म पूरक नहीं बल्कि विरोध का विषय है .आज धर्म की ध्वजा आधुनिक संतों और बाबाओं के हाथ है जो स्वभाव से रुढ़िवादी ,दकियानूसी ,परम्परावादी ,जड़वादी विचारों को स्थापित करते नजर आते है .उनके लिए धर्म दूसरों को मुर्ख बनाने ,आस्था का बाजारीकरण करने ,अपने दुश्मनों को लड़ाने का जरिया है .जबकि आज का साहित्य आधुनिक मानवीय मूल्यों ,आदर्शों .वैज्ञानिक नजरिया .तर्कवादी सोच के साथ –साथ समानता न्याय और बंधुत्व में विश्वास रखता है .समाज के अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति की आवाज बनने के लिए व्याकुल रहता है. आज का साहित्य अपने विजन को इतना बड़ा कर दिया है कि दलित ,आदिवासी और स्त्री की पीड़ा को मुखरता से आवाज दे रहा है .जबकि धर्म अपने संकीर्णता की ओर बढ़ रहा है .
    इसके बावजूद सवाल यह है कि धर्म आज भी एक बड़े जनमानस को मानसिक गुलाम बनाया हुआ है .बड़े –बड़े धार्मिक उत्सवों और जलसों में करोडों का वारा न्यारा होता है .स्वयंभू बाबाओं की धनलिप्सा और यशलिप्सा दिन दूने रात चौगुने की तरह बढ़ रहा है .धर्म की बेली अन्धाधुन बढ़ रही है .जबकि दूसरी तरफ सच्चाई यह है कि साहित्य और साहित्यकार आर्थिक दरिद्रता के शिकार हो रहे है .कितनी अच्छी पत्रिकाएं सिर्फ आर्थिक कारणों से दम तोड़ दी और कितनी बंद होने की कगार पर है .एक स्वतंत्र लेखक सिर्फ लेखनी के बल पर जीवन की बुनियादी जरूरत भी पूरा नहीं कर पाता है .यह किस तरह का देश और समाज है कि पढ़े –लिखे होने के बावजूद भी बाबाओं के धर्म की दुकान चमकाने में खुले हाथों से अपनी तिजोरी लुटाता है .धूर्त और पाखंडी बाबाओं की चरणपादुका पर मत्था टेकता है .वही दूसरी तरफ साहित्यकार आजीवन उपेक्षा का शिकार होता है .बाबा अपने प्रचलित विषय आत्मा –परमात्मा ,हिंसा –अहिंसा ,प्रेम –नफरत ,शाकाहारी –मांसाहारी के बहस से आगे नहीं बढ़ पाया है .प्रत्येक बाबा चाहे कोई उसका पंथ या धर्म हो वह इन्ही मोटी –मोटी बातों में उलझाकर मोटी रकम वसूलता है .जबकि साहित्य इन चीजों से बहुत आगे निकल कर मनुष्य के समकालीन समस्या और चुनौतियों को विषय बनाते हुए रोजमर्रा की जिन्दगी को सुलझाने का प्रयास कर रहा है .साहित्य की चिंता स्वर्ग –नर्क की चिंता नही अपितु मनुष्यता को बचाने की चिंता है .आधुनिक मानव के साथ कंधे से कन्धा मिलाकर चलने की चिंता है .साहित्य का सपना एक सचेत ,जागरूक ,संवेदनशील ,तर्कशील उच्च व्यक्तित्व से परिपूर्ण मनुष्य बनाने का है जबकि धर्म भले दावे कुछ करे लेकिन ठीक इसके विपरीत चल रहा है .
   आज भी भारत में धन का जितना बड़ा हिस्सा धर्म और उसके कर्मकांड में खर्च किए जाते है .उतने पैसे में भारत के हरेक पंचायत स्तर पर एक समृद्ध और विशाल पुस्तकालय खोला जा सकता है .पत्रिकाओं को एक उचित सहयोग दिया जा सकता है .तथाकथित बाबाओं और संतों के विलासी व भोगवादी जीवन के अंश मात्र से लेखक एक बेहतर जिन्दगी जीते हुए साहित्य सृजन कर सकता है .कई प्रतिभाशाली साहित्यकार इसलिए बेहतर रच नहीं पाते है कि उनके पास रोजी –रोटी की तलाश में अपना महत्वपूर्ण जीवन को खपा देना पड़ता है .
     साहित्य एक समय भले धर्म की बैसाखी लेकर चला था .लेकिन आज दोनों के लक्ष्य जुदा –जुदा है. धर्म एक जड़वादी मानव विरोधी तेवर के रूप में तेजी से उभर रहा है .वह आस्था और भावनाओं को भड़काकर हिंसा और कत्लेआम तक करवा रहा है .यानी धर्म एक ऐसी अमूर्त अवधारणा बन गई है जिसका कोई भी बाबा या सांप्रदायिक व्यक्ति अपने स्वार्थ और हीत के हिसाब से उसकी परिभाषा और व्याख्या करके आसानी से इस्तेमाल कर सकता है .इनके मठों , मंदिरों और पंडालो में हिंसा ,हत्या ,बलात्कार ,नफरत जैसी गतिविधियाँ चलती है .धर्म के इस मानव विरोधी गतिविधि को रोकने का सामर्थ्य साहित्य को है .साहित्य के द्वारा उनके सोचने –समझने की तरीको में बदलाव करके धर्म के पसरते हुए पांव को रोक सकता है .
  जिस इक्कीसवीं सदी में ज्ञान का विस्फोट होने से साहित्य को गली –गली में अपने स्वर ऊचे करने चाहिए थे लेकिन दुःख की बात यह है कि भारतीय समाज आज भी धर्म भीरुता के दलदल में फंसा हुआ नजर आ रहा है .जिस युवाओं को एक जुट होकर बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, असमानता ,भेदभाव ,अन्याय ,शोषण के खिलाफ लड़ना था वह आज धर्म की ध्वजा लेकर ‘गर्व से कहो हम हिन्दू है’ के नारे लगा रहे है. दरअसल राजनीतिक सत्ता भी यही चाहती है कि देश के युवा बुनियादी समस्याओं से बेखबर होकर धर्म –धर्म चिल्लाएं .ताकि उन्हें राजनीति की सत्ता का भोग करने में उन्हें किसी तरह के बिघ्न या बाधा पैदा न हो इन सबके प्रति जागरूक और लड़ने का साहस पैदा करने का माद्दा साहित्य ही रखता है .साहित्य सीधे क्रांति तो नहीं कर सकता लेकिन इन बदलाओं में सामाजिक चेतना का मशाल जला सकता है .इसलिए संस्थाबद्ध धर्म मानवता का रक्षक कभी नहीं हो सकता .मानवता की रक्षा के लिए साहित्य और साहित्यकार को विचारों की मशाल लेकर आगे आना चाहिए .
                                   नवीन जी को -
                         जिनके मौन के निरवरता में भी

                         ज्ञान की चुप्पी छिपी होती है .                            

Comments

Popular posts from this blog

शिक्षा का दर्शन और समरहिल / जितेन्द्र यादव