राजनीति के अंगने में धर्म का क्या काम है ? - जितेन्द्र यादव
'हम तो ठहरे अजनबी
कितनी मुलाकातों के बाद
खून के धब्बे धुलेंगे
कितनी बरसातों के बाद’ -फैज अहमद फैज
जिस
देश की साक्षरता पन्द्रह फीसदी से बढ़कर पैसठ फीसदी हो गई हो . जो देश दुनिया का
सबसे बड़ा अर्थव्यवस्था बनने की ओर जद्दोजहद कर रहा हो. जहाँ हरेक दशक में शिक्षा
की नई –नई नीतियाँ बनती हो. जहाँ प्रतिवर्ष सैकड़ों विद्यालय, कालेज, मेडिकल ,इंजीनियरिंग संस्थान खुलते
हो .जो देश सैकड़ो स्मार्ट सिटी बसाने का ताकत रखता हो .उस देश में राजनीति और धर्म
को लेकर इतनी गलतफहमियां क्यों है ? यह सच है कि राजनेता से लेकर जनता तक सभी किसी न
किसी धर्म के अनुयायी होते है .कई बार तो धर्म और संस्कृति के सम्बन्धों को अलग
करके देखना जटिल हो जाता है . आस्तिक और नास्तिक की परिभाषाएं भी अपने हिसाब से
गढ़ी जाती है .चुनाव आते ही राजनीतिक नेताओं के मजहबी चश्मा का लेंस भी बढ़ जाता है
.राजनेता चुनाव की फैक्ट्री में जनता की नागरिक पहचान को धार्मिक पहचान में ढाल
देता है .जनता की धार्मिक पहचान आपस में टकराने लगती है .हर नेता अपने को धर्म
विशेष का मसीहा घोषित करने लगता है .हिंदुत्व के नेता मुसलमान को खतरा बताकर
हिन्दू मत को अपने पाले में ध्रुवीकरण करना चाहता है .तो दूसरी तरफ एक तबका
धर्मनिरपेक्षता का दुहाई देकर भयभीत मुसलमान को सुरक्षा की गारंटी देकर मुसलमान मत
को अपने पाले में रखना चाहता है .इसलिए चुनाव में चाहे हिन्दुत्ववादी पार्टी जीते
या तथाकथित धर्मनिरपेक्षतावादी पार्टी लेकिन इंसानियत हर चुनाव में हार जाती है .
तो
सवाल यह है कि राजनीति में हर नेता धर्म को ओट बैंक का इतना सस्ता तरीका क्यों मानता
है ? क्या हमें नहीं लगता कि हम लोग अपनी धार्मिक भावनाओं को इतना कोमल बना दिया है
कि मिनट –मिनट पर आहत होती रहती है ? क्या हमें नहीं लगता कि हमने धार्मिक अस्मिताओं का इतना बढ़ा
–चढ़ाकर पेश कर दिया है कि
हमारी धार्मिक अस्मिता हमेशा खतरे में दिखाई देती है ?हम इन्सान होकर भी इन्सान
के बजाय गाय ,बन्दर ,सूअर को धार्मिक प्रतीक मान लिया है. धर्म एक निहायत व्यक्तिगत मसला होने के
बावजूद हमने अपने उपर अत्याचार करने के लिए धर्म के ठेकेदारों की फ़ौज खड़ी कर दी है
.जो आए दिन हमें नसीहत देते है कि हमें क्या खाना चाहिए ?क्या पहनना चाहिए ? किस देवता को पूजना चाहिए ? कौन से व्रत से क्या फायदा
होता है ? क्या दान करना चाहिए ? कौन सा कर्मकांड कैसे करना चाहिए ? क्या धार्मिक है क्या
अधार्मिक है ? मजे कि बात तो यह है कि जो धर्म गुरु जनता को कल तक नसीहत देते फिरते है वही
बाद में सलाखों के पीछे पाए जाते है . जनता हर बार यह नाटक बाबाओं या राजनेताओं की
देखती है उसके बावजूद उनके जाल में पंचतंत्र कहानी की उस कबूतर की तरह फंस जाती है
जिसे पता होता है कि जंगल में चावल कहाँ से आएगा ? जरुर किसी बहेलिये की साजिश
है किन्तु बूढा कबूतर को बार –बार मना करने के बावजूद सारी कबूतर चावल का दाना चुगने बैठ
जाती है और अंततः जाल में फंस जाती है .किन्तु वहाँ तो उनका सगा –साथी चूहा मदद भी कर देता
है लेकिन यहाँ पर कोई मदद नहीं करता बल्कि उस जाल के धागे को और मजबूत ही कर देता
है .
इससे
जाहिर है कि उनके के बहकावे से कम, हम अपनी मूर्खताओं के कारण ज्यादा फंसते है .
भारत देश का हर छात्र अपने देश पर निबन्ध लिखते समय पहली पंक्ति यही लिखता है कि
भारत एक बहुधार्मिक ,बहुसांस्कृतिक ,बहुभाषीक देश है .यहाँ अनेकता में एकता है .
किन्तु जैसे –जैसे वह बड़ा होता है उसकी यह अनेकता –एकता की परिभाषा अपने दायरे तक सिमट जाती है
उसकी उदारता अनुदारता में बदल जाती है .धर्मनिरपेक्षता उसे गाली लगने लगती है
.लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हमारे संविधान के इसी विशेषता के कारण अपने
पड़ोसी मुल्कों से दुनिया में एक अलग पहचान है .धर्मनिरपेक्षता हमारे भारत की
बुनियादी अवधारणा है. धर्मनिरपेक्षता किसी पार्टी की घोषणा पत्र की तरह नहीं बल्कि
देश के हर नागरिक के जीवन मूल्य से जुड़ा हुआ होना चाहिए है .यहाँ जितनी तरह की
विभिन्नता है दुनिया के शायद ही किसी देश में हो .किन्तु हमारी इस विशेषता को हमारे
राजनेता हमारी कमजोरी समझते है .इसी लिए गाहे –बगाहे बेतुके बयानों से अपनी सियासत की जमीन
तलाशते है .
आजादी के पहले अंग्रेजो ने धर्म को आधार बनाकर लम्बे समय तक सत्ता को बनाए
रखा जिसे ‘फूट डालो राज करो’ की नीति कहा जाता है . उनकी इस नीति का दुष्परिणाम भारत और
पाकिस्तान के रूप में दिखाई देता है. जो धर्म की बड़ी मानवीय त्रासदी के रूप में
याद किया जाता है .इन्ही घटनाओं से सीख लेते हुए हमारे संविधान निर्माताओं ने भारत
को एक धर्म निरपेक्ष देश बनाने का निर्णय लिया . जिसका सीधा अर्थ यह था कि राज्य
किसी धर्म को दूसरे पर थोप नहीं सकता धर्म एक व्यक्तिगत आस्था व श्रद्धा का विषय
होगा . राष्ट्र का आधार धर्म नहीं बल्कि उसके नागरिक होंगे .अर्थात धर्म और
राजनीति का कोई सहसम्बन्ध नहीं होगा. लेकिन धर्म के आधार पर हो रहे छुआछूत, ऊच –नीच के लिए राज्य धर्म में
हस्तक्षेप कर सकता है .
आजादी के बाद भारतीय राजनीति में धर्म के पदार्पण का चिह्न दिखाई देने लगता
है .स्वामी करपात्री की रामराज्य परिषद पार्टी विशुद्ध रूप से धार्मिक आधारों पर
टिकी हुई थी .उसके बाद श्यामा प्रसाद मुखर्जी की जनसंघ पार्टी आती है जिसका झुकाव
धार्मिकता की ओर था. फिर बाद में उसका रूपान्तरण भाजपा के रूप में होता है जिसकी
ऐतिहासिक यात्रा ही बाबरी बिध्वंस और राममन्दिर आन्दोलन से होकर गुजरी है . सोमनाथ
से अयोध्या की रथयात्रा पूरी तरह से हिन्दू जनभावनाओं को उभारना था .ताकि उसे
हिन्दू मतदाता के रूप में इस्तेमाल किया जा सके . कांग्रेस शासन में राजीव गांधी
के समय धर्म से जुड़ी हुई दो बड़ी घटना इतिहास में दर्ज होती है पहला शाहबानो का
मामला जिसमें मुसलमान कट्टरपंथी को संतुष्ट करने का प्रयास गया था. दूसरा बाबरी
मस्जिद का कपाट हिन्दुओं के लिए खोलकर हिन्दू कट्टरपंथी को संतुष्ट किया गया .इसके
साथ ही कई सारी छोटी –बड़ी घटना भारतीय राजनीति में दर्ज है जिसका प्रत्यक्ष –अप्रत्यक्ष सम्बन्ध धर्म से
जुड़ा हुआ था .
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि भारतीय राजनीति में नब्बे की दशक के बाद
से धार्मिक असहिष्णुता तेजी से बढ़ी है. बाबरी विध्वंस के बाद भारतीय राजनीति में
एक भूचाल आ गया. जिसके बाद दो समुदायों में क्रिया –प्रतिक्रिया का दौर शुरू
होता है. राजनीति दूषित दिखाई देने लगती है . अब राजनीति में कट्टरता ,नफरत को विशेष तवज्जों
मिलने लगता है. दंगा और साम्प्रदायिक हिंसा कराने वाले दंगाई राजनीति के रहनुमा बन
जाते है .दंगाई खुलेआम मंचों से सम्मानित होने लगते है .चारों तरफ उनका महिमामंडन
सुनाई देने लगता है . राजनीति और सांप्रदायिक हिंसा का सम्बन्ध प्रगाढ़ हो जाता है
.चुनाओं से पहले सांप्रदायिक हिंसा अब एक आम बात हो जाती है .इसी स्थिति को देखकर
कवि गोरख पाण्डेय ने भी लिखा था –
इस बार दंगा / बहुत बड़ा था
खूब हुई थी/ खून की बारिस
अगले साल अच्छी होगी
फसल मतदान की .
धर्म और राजनीति के घालमेल से होने वाले खतरे को
भांप कर दुनिया के कई देशों की राजसत्ता ने धर्म सत्ता से किनारा कर लिया .अभी हाल
ही में नेपाल जो खुद को हिन्दू राष्ट्र घोषित किया था अब वह खुद धर्मनिरपेक्ष देश
बनने का निर्णय ले लिया .हमारे आस –पास के मुल्कों से बराबर उदाहरण मिलते रहते है
कि किसी एक धर्म को राष्ट्रीय धर्म घोषित करने के क्या खतरे होते है . आईएस आइएस
जो धर्म को आधार बनाकर एक बड़ा इस्लामिक देश बनाना चाहता है उसके मानवीय बर्बरता का
तांडव व क्रूरता का नंगा नाच हम हर रोज देख रहे है .इसके पीछे भी धर्म की वही सोच
काम कर रही है कि धर्म राष्ट्र का आधार हो और उस धर्म को मानने वाले प्रथम श्रेणी
के नागरिक होंगे और दूसरे धर्मावलम्बी रहेंगे ही नहीं या रहेंगे भी तो दोयम दर्जे
के नागरिक होंगे. यदि दुनिया के इतिहास को खंगालकर देखा जाए तो धार्मिक उन्मादों
को उभारकर राजनीतिक फायदा भले हुआ हो लेकिन किसी देश या राष्ट्र का भला नहीं हुआ
है. पूरा इतिहास धार्मिक उन्माद के काले पन्नों से भरा हुआ है .हमारे भारत जैसे
देश में धर्म का राजनीतिक उपकरण के रूप में प्रयोग का एक लम्बा सिलसिला रहा है
.यहाँ के प्राय: सभी नागरिक यह कहते हुए मिल जायेंगे कि साम्प्रदायिक हिंसा
राजनेता करवाते है और इसमें गरीब लोग मरते है .फिर भी जब दंगा होता है तो लोग बढ़ –चढ़कर भाग लेते है. उस समय
उनका वह विवेक कहाँ चला जाता है यह सच-मुच शोचनीय विषय है.
इस
मानवीय दुनिया का कर्ता और नियामक मानव है और उसका केन्द्रीय धुरी भी वही है .
धर्म ,रीति –रिवाज ,संस्कृति ,परम्परा एक बेहतर जीवन जीने के साधन और उपकरण हो सकते है किन्तु साध्य नहीं .
बुद्ध ने भी कहा था ‘यह धर्म रूपी नाव जीवन रूपी नदी को पार करने के लिए दिया है
उसे सिर पर लेकर ढोने के लिए नहीं’ किन्तु ताज्जुब है कि हम अब धर्म रूपी नाव को
सिर पर लेकर ढो ही नही रहे बल्कि उसमें सिर को लड़ाकर फोड़ भी रहे है. अब धर्मरूपी
नाव राजनीति रूपी नदी को पार करने का सहारा बनता जा रहा है .जब तक राजनीति और धर्म
के बीच पनप रहे नए रिश्ते को सही ढंग से पहचाना नहीं जाएगा .तब तक इन दोनों के बीच
गलतफहमियां ,अफवाहें ,सांप्रदायिक हिंसा व तनाव फैलते रहेंगे और हम विवेक शून्य होकर मूक दर्शक बने
रहेंगे .
गाँधी जी कहा करते थे कि ‘धर्म को राजनीति से अलग
नहीं किया जा सकता .धर्म से उनका मतलब हिन्दू या इस्लाम जैसे धर्म से न होकर नैतिक
मूल्यों से था जो सभी धर्मो से जुड़े हैं राजनीति धर्म द्वारा स्थापित मूल्यों से
निर्देशित होना चाहिए’ .किन्तु गाँधी जी के दिमाग में राजनीति और धर्म की जो आदर्श
छबि बनी हुई थी वह आज सिरे से गायब है .धर्म राजनीति से जुड़ा हुआ तो जरुर हैं
लेकिन नैतिक मूल्यों के लिए नहीं बल्कि राजनीतिक लाभ के लिए है . अब धर्म राजनीति
में एक खूखार और खतरनाक अर्थ को ध्वनित करता है .वह अपने मूल अर्थ को खो चूका है
.इसलिए राजनीति को धर्म से अलग करके नैतिक मूल्य को मापदंड बनाकर स्थापित किया
जाना चाहिए . जिससे कि वर्तमान में जो प्रचलित धर्म का संक्रामक व खतरनाक रूप है
उससे राजनीति को बचाया जा सके.
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